📖 बृहदारण्यक उपनिषद् 1.3.8
मन्त्र
ते होचुः — क्व नु सः अभूत् यः न इत्थम् असक्त ?
इति । अयम् आस्ये अन्तरिति ।
सः अयास्यः आङ्गिरसः ।
अङ्गानां हि रसः ॥
1. शब्द-शब्द अर्थ (Word by Word Meaning)
| संस्कृत शब्द | हिन्दी अर्थ | English Meaning |
|---|---|---|
| ते | वे (देवता) | they (the gods) |
| होचुः | उन्होंने कहा | said |
| क्व | कहाँ | where |
| नु | वास्तव में | indeed |
| सः | वह | he |
| अभूत् | था | was |
| यः | जो | who |
| न | नहीं | not |
| इत्थम् | इस प्रकार | in this way |
| असक्त | दूषित हुआ | affected |
| अयम् | यह | this |
| आस्ये | मुख में | in the mouth |
| अन्तर् | भीतर | inside |
| अयास्य | जिसका नाश न हो | indestructible |
| आङ्गिरस | अंगों का सार | essence of limbs |
| अङ्गानाम् | अंगों का | of the limbs |
| रसः | सार | essence |
2. सरल हिन्दी भावार्थ
देवताओं ने कहा:
“वह कौन था जो इस प्रकार असुरों के आक्रमण से प्रभावित नहीं हुआ?”
उन्होंने खोज कर पाया कि वह मुख के भीतर स्थित प्राण है।
उसी को अयास्य आङ्गिरस कहा गया है।
क्योंकि वह सभी अंगों का सार (रस) है।
3. गहरी दार्शनिक व्याख्या (Deep Philosophical Meaning)
यह मन्त्र उपनिषद् की एक अत्यन्त गूढ़ आध्यात्मिक शिक्षा देता है।
पिछले मन्त्रों में बताया गया कि:
- वाणी दूषित हो सकती है
- घ्राण दूषित हो सकता है
- दृष्टि दूषित हो सकती है
- श्रवण दूषित हो सकता है
- मन भी दूषित हो सकता है
लेकिन जब असुरों ने प्राण पर आक्रमण किया तो वे स्वयं नष्ट हो गए।
अब देवता यह समझना चाहते हैं कि यह अद्भुत शक्ति कहाँ स्थित है।
उपनिषद् कहता है कि यह शक्ति मुख के भीतर स्थित प्राण है।
4. “आङ्गिरस” शब्द का अर्थ
उपनिषद् यहाँ एक विशेष शब्द प्रयोग करता है — आङ्गिरस।
यह दो शब्दों से बना है:
अङ्ग + रस
अर्थात्
शरीर के सभी अंगों का सार।
यह बताता है कि:
- शरीर का आधार प्राण है
- इन्द्रियाँ प्राण से ही कार्य करती हैं
- मन भी प्राण से ही सक्रिय रहता है।
यदि प्राण शरीर से निकल जाए तो:
- वाणी रुक जाती है
- आँखें देखना बंद कर देती हैं
- कान सुनना बंद कर देते हैं
- मन भी कार्य करना बंद कर देता है।
इसलिए प्राण को अंगों का सार कहा गया है।
5. अन्य उपनिषदों में प्राण की महिमा
(1) प्रश्न उपनिषद्
प्रश्न उपनिषद् कहता है:
प्राणो हि भूतानामायुः
अर्थ — प्राण ही सभी प्राणियों का जीवन है।
(2) छान्दोग्य उपनिषद्
छान्दोग्य उपनिषद् में कहा गया है:
प्राण एवेदं सर्वम्
अर्थ — यह सम्पूर्ण जगत प्राण से ही संचालित है।
(3) तैत्तिरीय उपनिषद्
तैत्तिरीय उपनिषद् में प्राणमय कोश का वर्णन है।
अर्थात् मनुष्य का दूसरा आवरण प्राण का है।
यह दिखाता है कि जीवन की ऊर्जा का मूल स्रोत प्राण है।
6. योग और आध्यात्मिक साधना में अर्थ
योग परम्परा में प्राण को नियंत्रित करने की साधना को प्राणायाम कहा जाता है।
जब मनुष्य:
- श्वास को नियंत्रित करता है
- प्राण को संतुलित करता है
तब उसका मन स्थिर हो जाता है।
इसी कारण:
- ध्यान गहरा होता है
- चेतना शुद्ध होती है
- आत्मज्ञान की संभावना बढ़ जाती है।
7. आध्यात्मिक संदेश
यह मन्त्र हमें तीन महत्वपूर्ण बातें सिखाता है:
1. प्राण जीवन की मूल शक्ति है
सभी इन्द्रियाँ प्राण पर निर्भर हैं।
2. प्राण शुद्ध और अजेय है
नकारात्मक शक्तियाँ उसे दूषित नहीं कर सकतीं।
3. प्राण का ज्ञान आध्यात्मिक शक्ति देता है
जो व्यक्ति इस सत्य को जानता है वह जीवन में स्थिर और शक्तिशाली बनता है।
8. English Explanation
In this verse the gods wonder:
“Who was that power which could not be corrupted by the demons?”
They discover that it is the vital force (Prāṇa) residing within the mouth.
The Upanishad calls this power Āṅgirasa, meaning the essence of all the limbs.
The teaching here is profound: while senses and mind can be corrupted, the vital life force remains pure and fundamental. All organs function because of Prāṇa.
Thus Prāṇa is described as the core life-energy that sustains the entire body and consciousness.