Brihadaranyaka Upanishad 1.3.7 hindi english explanation

 

📖 बृहदारण्यक उपनिषद् 1.3.7

मन्त्र

अथ हेममासन्यं प्राणमूचुः — त्वं न उद्गायेति ।
तथेति । तेभ्य एष प्राण उदगायत् ।
ते विदुः अनेन वै न उद्गात्रा अत्येष्यन्ति इति ।
तमभिद्रुत्य पाप्मना अविध्यन् ।
स यथा अश्मानम् ऋत्वा लोष्टः विध्वंसते एवम् हैव विध्वंसमानाः विष्वञ्चः विनेशुः ।
ततः देवाः अभवन्, परा असुराः ।
भवति आत्मना परा अस्य द्विषन् भ्रातृव्यः भवति य एवं वेद ॥


1. सरल हिन्दी भावार्थ

इस मन्त्र में देवताओं ने अंततः प्राण से कहा — “तुम हमारे लिए उद्गीथ का गायन करो।”

प्राण ने देवताओं के लिए उद्गीथ का गायन किया।
असुरों ने सोचा कि यदि यह प्राण भी देवताओं की सहायता करेगा तो वे पराजित हो जाएंगे, इसलिए उन्होंने प्राण पर भी आक्रमण किया।

किन्तु यहाँ एक महत्वपूर्ण घटना होती है।

जब असुरों ने प्राण को दूषित करने का प्रयास किया, तो वे स्वयं ही नष्ट हो गए। उपनिषद् इस स्थिति को एक सुंदर उपमा से समझाता है:

जैसे कोई मिट्टी का ढेला पत्थर से टकराकर स्वयं टूट जाता है, वैसे ही असुर प्राण पर आक्रमण करके स्वयं नष्ट हो गए।

इसके बाद देवता विजयी हुए और असुर पराजित हो गए।

उपनिषद् अंत में कहता है कि जो मनुष्य इस सत्य को जानता है, वह स्वयं भी अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त करता है।


2. गहरी दार्शनिक व्याख्या

यह मन्त्र उपनिषद् के अत्यन्त गूढ़ सिद्धान्त को प्रकट करता है।

इससे पहले के मन्त्रों में हमने देखा कि:

  • वाणी दूषित हो सकती है
  • प्राण की गंध (घ्राण) दूषित हो सकती है
  • दृष्टि दूषित हो सकती है
  • श्रवण दूषित हो सकता है
  • मन भी दूषित हो सकता है

लेकिन प्राण को असुर दूषित नहीं कर सके।

क्यों?

क्योंकि उपनिषद् के अनुसार प्राण जीवन की मूल शक्ति है
यह केवल शरीर की श्वास नहीं है बल्कि संपूर्ण जीवन ऊर्जा है।

जब तक प्राण शुद्ध है, तब तक जीवन की चेतना भी शुद्ध रहती है।

इसलिए उपनिषद् यह बताता है कि:

प्राण ही वह शक्ति है जो इन्द्रियों और मन को जीवन प्रदान करती है।


3. प्राण का वैदिक महत्व

वेदों और उपनिषदों में प्राण को अत्यन्त उच्च स्थान दिया गया है।

(1) प्रश्न उपनिषद्

प्रश्न उपनिषद् में प्राण को देवताओं का राजा कहा गया है।

“प्राणो हि भूतानामायुः”

अर्थ — प्राण ही सभी प्राणियों का जीवन है।


(2) छान्दोग्य उपनिषद्

छान्दोग्य उपनिषद् में कहा गया है:

“प्राण एवेदं सर्वम्”

अर्थ — यह सम्पूर्ण जगत प्राण से ही संचालित है।


(3) ऋग्वेद

ऋग्वेद में प्रार्थना है:

“प्राणाय स्वाहा”

यह प्राण को दिव्य शक्ति के रूप में स्वीकार करता है।


4. उपनिषद् की प्रतीकात्मक शिक्षा

इस कथा में देवता और असुर वास्तव में मानव जीवन के दो पक्षों का प्रतीक हैं।

देवता असुर
ज्ञान अज्ञान
सद्गुण दुर्गुण
सत्य असत्य

जब मनुष्य की इन्द्रियाँ दूषित हो जाती हैं तो जीवन में भ्रम उत्पन्न होता है।

लेकिन जब मनुष्य प्राण की शक्ति को पहचानता है, तब उसके भीतर एक आंतरिक स्थिरता उत्पन्न होती है।


5. योग दर्शन में प्राण

योगशास्त्र में भी प्राण को अत्यन्त महत्व दिया गया है।

पतंजलि योगसूत्र में प्राणायाम को मन की शुद्धि का साधन बताया गया है।

जब मनुष्य:

  • श्वास को नियंत्रित करता है
  • प्राण को संतुलित करता है

तब मन और इन्द्रियाँ भी शुद्ध हो जाती हैं।


6. आध्यात्मिक अर्थ

इस मन्त्र का गहरा संदेश यह है कि:

  • बाहरी इन्द्रियाँ सीमित हैं
  • मन भी भ्रमित हो सकता है
  • लेकिन प्राण जीवन की मूल शक्ति है।

जब मनुष्य अपने भीतर के प्राण को पहचान लेता है, तब वह आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त करता है

इस स्थिति में:

  • नकारात्मक शक्तियाँ उसे प्रभावित नहीं कर पातीं
  • उसका मन स्थिर हो जाता है
  • और वह आत्मिक विजय प्राप्त करता है।

7. English Explanation

This verse describes the final stage where the Devas ask the vital force (Prāṇa) to chant the Udgītha.

When the Asuras attempt to corrupt Prāṇa, they fail. Instead, they destroy themselves—just like a lump of clay shattering when thrown against a stone.

The Upanishad teaches that while senses and mind can be corrupted, Prāṇa remains the fundamental life force that sustains everything.

In yogic philosophy, Prāṇa represents the universal energy that flows through all beings. When a person understands and harmonizes this life force, they gain inner strength and spiritual victory.



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