Brihadaranyaka Upanishad 1.2.6 hindi english explanation

 

मन्त्र

सोऽकामयत भूयसा यज्ञेन भूयो यजेयेति । सोऽश्राम्यत् स
तपोऽतप्यत । तस्य श्रान्तस्य तप्तस्य यशो वीर्यमुदक्रामत् प्राणा
वै यशो वीर्यम् । तत् प्राणेषूत्क्रान्तेषु शरीरꣳ श्वयितुमध्रियत
तस्य शरीर एव मन आसीत् ॥ ६॥


हिन्दी में शब्दार्थ (Word-by-Word Meaning)

संस्कृत शब्द हिन्दी अर्थ
सः वह (परम चेतना)
अकामयत इच्छा की
भूयसा अधिक
यज्ञेन यज्ञ के द्वारा
भूयः और अधिक
यजेय यज्ञ करूँ
अश्राम्यत वह थक गया
तपः अतप्यत तपस्या की
श्रान्तस्य थके हुए
तप्तस्य तप करने वाले
यशः तेज / यश
वीर्यम् शक्ति
उदक्रामत् बाहर निकल गया
प्राणाः जीवन शक्तियाँ
शरीरम् शरीर
मनः मन

हिन्दी में विस्तृत व्याख्या

यह मन्त्र यज्ञ, तप, प्राण और मन के सम्बन्ध को समझाता है।

1. अधिक यज्ञ करने की इच्छा

मन्त्र कहता है कि सृष्टिकर्ता ने विचार किया:

“मैं और अधिक यज्ञ करूँ।”

यहाँ यज्ञ का अर्थ केवल अग्नि में आहुति देना नहीं है, बल्कि सृष्टि का सतत् निर्माण और पालन है।


2. तप और परिश्रम

फिर कहा गया:

“सोऽश्राम्यत् स तपोऽतप्यत”

अर्थात् उसने परिश्रम किया और तपस्या की

यह संकेत देता है कि सृजन और महान कार्य तप और प्रयास से ही सम्भव होते हैं।


3. प्राण ही यश और वीर्य हैं

मन्त्र में कहा गया:

“प्राणा वै यशो वीर्यम्”

अर्थात् प्राण ही यश और शक्ति हैं।

जब प्राण शरीर में रहते हैं तब:

  • ऊर्जा
  • शक्ति
  • जीवन

सब बने रहते हैं।


4. प्राण निकलने पर शरीर निर्जीव

जब प्राण बाहर निकल जाते हैं, तब:

शरीर शिथिल और निर्जीव हो जाता है।

इसलिए वेद बताते हैं कि प्राण ही जीवन का मूल आधार है।


5. शरीर में मन का निवास

मन्त्र का अन्त कहता है:

“तस्य शरीर एव मन आसीत्”

अर्थात् उस शरीर में मन का निवास था

यह बताता है कि:

  • प्राण → जीवन शक्ति
  • मन → चेतना और विचार

दोनों मिलकर जीवन को संचालित करते हैं।


English Explanation

This verse explains the relationship between sacrifice (yajña), austerity (tapas), life force (prāṇa), and mind.

1. Desire for Greater Sacrifice

The creator desired:

"Let me perform a greater sacrifice."

Here yajña symbolizes the ongoing process of creation and cosmic order.


2. Effort and Austerity

He performed tapas (austerity) and exerted great effort.

This symbolizes that creation and transformation require discipline and energy.


3. Prana as Power and Glory

The verse states:

“Prāṇa indeed is glory and strength.”

Prana represents:

  • vitality
  • power
  • life force

4. When Prana Leaves

When the prana departs from the body, the body becomes lifeless.

Thus life exists only as long as prana remains.


5. Mind in the Body

Finally, the verse says that the mind resides in the body, guiding thought and awareness.



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