📖 बृहदारण्यक उपनिषद् 1.3.5
मन्त्र
अथ ह श्रोत्रमूचुः त्वं न उद्गायेति ।
तथेति । तेभ्यः श्रोत्रमुदगायत् ।
यः श्रोत्रे भोगस्तं देवेभ्य आगायत् यत्कल्याणं शृणोति तदात्मने ।
ते विदुः अनेन वै न उद्गात्रा अत्येष्यन्ति इति ।
तमभिद्रुत्य पाप्मना अविध्यन् ।
स यः स पाप्मा यदेव इदम् अप्रतिरूपं शृणोति स एव स पाप्मा ॥
1. शब्दार्थ (Word-by-Word Meaning)
| संस्कृत शब्द | हिन्दी अर्थ | English Meaning |
|---|---|---|
| अथ | तब | then |
| श्रोत्र | कान / श्रवण इन्द्रिय | ear / hearing |
| ऊचुः | कहा | said |
| उद्गायेति | उद्गीथ गाओ | sing the sacred chant |
| उदगायत् | गाया | sang |
| भोग | अनुभव | enjoyment / perception |
| कल्याणम् | शुभ / पवित्र | auspicious |
| शृणोति | सुनता है | hears |
| पाप्मा | पाप / दोष | impurity |
| अप्रतिरूपम् | अनुचित / विकृत | improper / distorted |
2. सरल हिन्दी भावार्थ
देवताओं और असुरों के इस प्रतीकात्मक युद्ध में देवताओं ने अब श्रोत्र (श्रवण शक्ति) से कहा — “तुम हमारे लिए उद्गीथ का गायन करो।”
श्रोत्र ने देवताओं के लिए उद्गीथ का गायन किया।
जो श्रवण का सुख और अनुभव था वह देवताओं को प्राप्त हुआ, और जो शुभ एवं मधुर वाणी का श्रवण है वह श्रोत्र के लिए रहा।
जब असुरों को यह पता चला कि इस शक्ति के द्वारा देवता विजयी हो सकते हैं, तब उन्होंने श्रोत्र पर भी पाप का आक्रमण किया।
इसका परिणाम यह हुआ कि श्रवण शक्ति में भी दोष उत्पन्न हो गया। इसलिए मनुष्य कभी-कभी:
- असत्य बातें सुनता है
- निन्दा और अपशब्द सुनने में रुचि लेता है
- या अनुचित और अशुभ शब्दों को ग्रहण करता है
उपनिषद् कहता है कि जो कुछ अनुचित या विकृत सुना जाता है वही श्रवण का पाप है।
3. दार्शनिक व्याख्या
यह मन्त्र हमें बताता है कि श्रवण ज्ञान प्राप्ति का अत्यन्त महत्वपूर्ण साधन है।
वेदों में ज्ञान की परम्परा मुख्यतः श्रुति पर आधारित है।
अर्थात् गुरु से शिष्य तक ज्ञान सुनने के माध्यम से पहुँचता है।
इसलिए यदि श्रवण शक्ति शुद्ध न हो तो मनुष्य:
- सत्य को पहचान नहीं सकता
- ज्ञान को ग्रहण नहीं कर सकता
- और आध्यात्मिक उन्नति नहीं कर सकता।
इस कथा का उद्देश्य यह बताना है कि अज्ञान (असुर) इन्द्रियों को दूषित कर देता है, इसलिए मनुष्य को अपनी इन्द्रियों की शुद्धि करनी चाहिए।
4. अन्य वैदिक ग्रन्थों से उदाहरण
(1) छान्दोग्य उपनिषद्
छान्दोग्य उपनिषद् में कहा गया है:
“श्रवणं मननं निदिध्यासनम्”
अर्थ — ज्ञान प्राप्ति का पहला चरण श्रवण है।
(2) ऋग्वेद
ऋग्वेद में प्रार्थना की गयी है:
“भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः”
अर्थ — हे देवताओं! हम अपने कानों से शुभ और मंगलमय वचन सुनें।
यह वही विचार है जो इस उपनिषद् मन्त्र में बताया गया है।
(3) मुण्डक उपनिषद्
मुण्डक उपनिषद् कहता है:
“तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत्”
अर्थ — ज्ञान प्राप्ति के लिए गुरु के पास जाना चाहिए और उनकी वाणी को सुनना चाहिए।
5. आध्यात्मिक शिक्षा
इस मन्त्र से तीन महत्वपूर्ण शिक्षाएँ मिलती हैं:
1. श्रवण ज्ञान का द्वार है
मनुष्य का आध्यात्मिक विकास सत्य सुनने से प्रारम्भ होता है।
2. अशुद्ध श्रवण मन को दूषित करता है
निन्दा, झूठ और नकारात्मक बातें मन को विकृत कर देती हैं।
3. सत्संग का महत्व
सत्संग, वेदपाठ और गुरु वचन सुनना श्रवण की शुद्धि का मार्ग है।
6. English Explanation
In this verse the Devas ask the Ear (hearing faculty) to chant the sacred Udgītha.
The ear performs the chant. The enjoyment of hearing goes to the Devas, while the ability to hear auspicious sounds remains with the ear.
The Asuras then attack the ear with impurity. Because of this corruption, humans sometimes hear improper, false, or unpleasant speech.
Philosophically, the Upanishad teaches that hearing is the gateway to knowledge, especially in the Vedic tradition where wisdom is transmitted through Śruti (that which is heard).
When the mind is pure, the ear hears truth and wisdom. When it is influenced by ignorance, it becomes attracted to false and harmful speech.