📖 बृहदारण्यक उपनिषद् 1.3.10
मन्त्र
सा वा एषा देवता एतासां देवतानां पाप्मानं मृत्युमपहत्य
यत्रासां दिशामन्तस्तद्गमयां चकार ।
तदासां पाप्मनो विन्यदधात् ।
तस्मान्न जनम् इयान् न अन्तम् इयान् ।
नेत् पाप्मानं मृत्युमन्ववायानीति ॥
1. शब्द-शब्द अर्थ (Word by Word Meaning)
| संस्कृत शब्द | हिन्दी अर्थ | English Meaning |
|---|---|---|
| सा | वह | that |
| वा | वास्तव में | indeed |
| एषा | यह | this |
| देवता | दिव्य शक्ति (प्राण) | divine power |
| एतासाम् | इन | of these |
| देवतानाम् | देवताओं का | of the gods |
| पाप्मानम् | पाप या दोष | sin / impurity |
| मृत्युम् | मृत्यु | death |
| अपहत्य | दूर करके | removing |
| यत्र | जहाँ | where |
| दिशाम् | दिशाओं के | of the directions |
| अन्तः | सीमा | end |
| तत् | वहाँ | there |
| गमयाम् चकार | पहुँचा दिया | carried away |
| तद् | उस | that |
| आसाम् | उनका | their |
| पाप्मनः | पाप को | sin |
| विन्यदधात् | अलग स्थापित किया | placed aside |
| तस्मात् | इसलिए | therefore |
| न | नहीं | not |
| जनम् | प्रारम्भ | beginning |
| इयान् | जाना चाहिए | should go |
| न | नहीं | not |
| अन्तम् | अंत | end |
| इयान् | जाना चाहिए | should go |
| नेत् | कहीं | lest |
| पाप्मानम् | पाप | sin |
| मृत्युम् | मृत्यु | death |
| अन्ववायानी | साथ लग जाए | may follow |
2. सरल हिन्दी भावार्थ
वह प्राणरूप देवता इन सभी देवताओं (इन्द्रियों) के पाप और मृत्यु को दूर करके उन्हें दिशाओं के अन्त तक ले गया और वहाँ उनके पाप को अलग रख दिया।
इसी कारण मनुष्य को न तो बहुत प्रारम्भ की ओर जाना चाहिए और न ही अन्त की ओर, क्योंकि वहाँ जाने से पाप और मृत्यु के समीप होने का भय रहता है।
3. गहरी दार्शनिक व्याख्या (लगभग 700 शब्द)
यह मन्त्र बृहदारण्यक उपनिषद् के उस महान् शिक्षण का भाग है जिसमें प्राण की सर्वोच्चता को बताया गया है।
पहले मन्त्रों में बताया गया कि:
- वाणी दूषित हो सकती है
- घ्राण दूषित हो सकता है
- दृष्टि दूषित हो सकती है
- श्रवण दूषित हो सकता है
- मन भी दूषित हो सकता है
जब असुरों ने इन सभी इन्द्रियों पर आक्रमण किया तो उनमें दोष उत्पन्न हो गया।
लेकिन प्राण पर आक्रमण करने से असुर स्वयं नष्ट हो गए।
अब यह मन्त्र बताता है कि प्राण ने क्या किया।
उपनिषद् कहता है कि प्राण ने:
- इन इन्द्रियों के पाप को दूर कर दिया
- मृत्यु को उनसे अलग कर दिया
- और उन्हें सुरक्षित स्थान पर स्थापित किया।
यह प्रतीकात्मक भाषा है।
इसका अर्थ है कि प्राण जीवन की शुद्ध करने वाली शक्ति है।
4. दिशाओं के अन्त का प्रतीक
मन्त्र में कहा गया है कि प्राण ने पाप और मृत्यु को दिशाओं के अन्त में रख दिया।
यह वास्तव में एक प्रतीक है।
वेदों में दिशा का अर्थ केवल भौगोलिक दिशा नहीं है बल्कि चेतना के क्षेत्र भी हैं।
अर्थात् प्राण ने:
- दोषों को जीवन के केन्द्र से दूर कर दिया
- और चेतना को शुद्ध बना दिया।
इससे यह शिक्षा मिलती है कि यदि मनुष्य अपने प्राण को संतुलित रखता है तो:
- उसका मन शुद्ध होता है
- इन्द्रियाँ नियंत्रित रहती हैं
- जीवन में संतुलन आता है।
5. अन्य वैदिक ग्रन्थों में समान विचार
(1) ऋग्वेद
ऋग्वेद में प्राण को जीवन की आधार शक्ति कहा गया है।
प्राणो विश्वस्य जगतः प्रतिष्ठा
अर्थ — प्राण सम्पूर्ण जगत का आधार है।
(2) छान्दोग्य उपनिषद्
छान्दोग्य उपनिषद् कहता है:
यथा नाभौ चक्रस्य सर्वे अरा प्रतिष्ठिता एवम् प्राणे सर्वम् प्रतिष्ठितम्।
अर्थ — जैसे चक्र की सभी तीलियाँ धुरी पर टिकती हैं, वैसे ही सब कुछ प्राण पर टिकता है।
(3) प्रश्न उपनिषद्
प्रश्न उपनिषद् में कहा गया है कि:
प्राण ही शरीर में सभी इन्द्रियों का राजा है।
जब प्राण चला जाता है तो इन्द्रियाँ भी शक्तिहीन हो जाती हैं।
6. आध्यात्मिक अर्थ
इस मन्त्र का एक अत्यन्त सूक्ष्म आध्यात्मिक अर्थ भी है।
मनुष्य के भीतर:
- इच्छाएँ
- भय
- पाप
- मृत्यु का डर
ये सभी मन और इन्द्रियों से जुड़े होते हैं।
लेकिन जब मनुष्य प्राण की चेतना में स्थित हो जाता है, तब:
- मन शुद्ध हो जाता है
- इन्द्रियाँ नियंत्रित हो जाती हैं
- भय समाप्त हो जाता है।
इसी कारण योग में प्राणायाम को अत्यन्त महत्वपूर्ण माना गया है।
7. योग और साधना में महत्व
योगशास्त्र के अनुसार:
जब प्राण संतुलित होता है तो:
- मन स्थिर हो जाता है
- चेतना ऊँचे स्तर पर पहुँच जाती है
- आध्यात्मिक अनुभव होने लगते हैं।
इसीलिए योगी लोग कहते हैं:
“प्राण को जीतने वाला मन को जीत लेता है।”
8. English Explanation
This verse describes how the vital force Prāṇa protects the other divine faculties (the senses).
It removes sin and death from them and places those impurities far away, symbolically at the “ends of the directions.”
The meaning is philosophical rather than geographical. It teaches that Prāṇa purifies and stabilizes the functions of the senses and mind.
When a person understands the nature of Prāṇa, life becomes balanced and the influence of negativity and mortality is transcended.
Thus the Upanishad presents Prāṇa as the central life-force that protects consciousness and harmonizes the human system.