Brihadaranyaka Upanishad 1.2.3 hindi english explanation

 

मन्त्र

स त्रेधाऽऽत्मानं व्यकुरुताऽऽदित्यं तृतीयं वायुं तृतीयम् ।
स एष प्राणस्त्रेधा विहितस्तस्य प्राची दिक्षिरोऽसौ चासौ चोर्माव
अथास्य प्रतीची दिक्पुच्छमसौ चासौ च सक्थ्यौ दक्षिणा चोदीची
च पार्श्वे द्यौः पृष्ठमन्तरिक्षमुदरमियमुरः स एषोऽप्सु
प्रतिष्ठितो यत्र क्व चैति तदेव प्रतितिष्ठत्येवं विद्वान् ॥ ३॥


हिंदी में विस्तृत व्याख्या

यह मन्त्र सृष्टि के प्राणतत्त्व और ब्रह्मांडीय संरचना का अत्यन्त गूढ़ वर्णन करता है।

1. आत्मा का तीन रूपों में विभाजन

मन्त्र कहता है कि परम आत्मा ने स्वयं को तीन भागों में प्रकट किया:

  1. आदित्य (सूर्य) – प्रकाश और ऊर्जा का स्रोत
  2. वायु – प्राण और गति का आधार
  3. प्राण – जीवन को चलाने वाली शक्ति

अर्थात् सम्पूर्ण जगत में जो जीवन और चेतना है, वह इन तीन शक्तियों से संचालित है।


2. ब्रह्मांड को प्राणरूप अश्व के समान बताया गया

यहाँ ब्रह्मांड को एक जीवित प्राणमय शरीर के रूप में समझाया गया है।

  • पूर्व दिशा (प्राची) – इसका सिर है
  • पश्चिम दिशा (प्रतीची) – इसकी पूँछ है
  • उत्तर और दक्षिण दिशाएँ – इसके दोनों पार्श्व हैं
  • आकाश (द्यौ) – इसकी पीठ है
  • अन्तरिक्ष – इसका उदर (पेट) है
  • पृथ्वी – इसका वक्षस्थल (छाती) है

इस प्रकार पूरा ब्रह्मांड एक जीवित शरीर की तरह है।


3. जल में स्थित प्राण

मन्त्र आगे कहता है:

“स एषोऽप्सु प्रतिष्ठितः”

अर्थात यह प्राण जल में स्थापित है
जल जीवन का आधार है, इसलिए जहाँ जल है वहाँ जीवन और प्राण की सम्भावना है।


4. दार्शनिक अर्थ

इस मन्त्र का गहरा संदेश है:

  • सम्पूर्ण ब्रह्मांड एक जीवित चेतन व्यवस्था है।
  • सूर्य, वायु और प्राण जीवन के मूल तत्व हैं।
  • जल जीवन का आधार है।
  • जो मनुष्य इस सत्य को समझता है, वह प्रकृति और ब्रह्मांड के साथ एकता का अनुभव करता है।

English Explanation

1. Division of the Cosmic Self

The verse states that the Supreme Self divided itself into three forms:

  1. Aditya (Sun) – source of light and energy
  2. Vayu (Air) – the principle of movement and breath
  3. Prana – the life force sustaining all beings

Thus, life in the universe operates through these three cosmic powers.


2. The Universe as a Living Being

The cosmos is described as a living organism.

  • East – its head
  • West – its tail
  • North and South – its sides
  • Heaven (Sky) – its back
  • Mid-space (Antariksha) – its belly
  • Earth – its chest

This symbolic imagery shows that the universe itself is a living cosmic body.


3. Life Established in Water

The verse states:

“He is established in water.”

Water is the foundation of life, and wherever water exists, life and vitality may arise.


4. Philosophical Meaning

The deeper teaching is:

  • The universe is a living, conscious system.
  • Sun, air, and prana sustain life.
  • Water is the fundamental basis of existence.
  • One who understands this truth realizes the unity of nature and life.


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